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Monday, April 27, 2020

प्रमुख भारतीय लेखक एवं उनकी पुस्तके

प्रमुख भारतीय लेखक एवं उनकी पुस्तके
◆पंचतंत्र ~ विष्णु शर्मा
●प्रेमवाटिका ~ रसखान
●मृच्छकटिकम् ~ शूद्रक
●कामसूत्र् ~ वात्स्यायन
●दायभाग ~ जीमूतवाहन
●नेचुरल हिस्द्री ~ प्लिनी
●दशकुमारचरितम् ~ दण्डी
●अवंती सुन्दरी ~ दण्डी
●बुध्दचरितम् ~ अश्वघोष
●कादम्बरी् ~ बाणभटृ
●अमरकोष ~ अमर सिहं
●शाहनामा ~ फिरदौसी
●साहित्यलहरी ~ सुरदास
●सूरसागर ~ सुरदास
●हुमायूँनामा ~ गुलबदन बेगम
●नीति शतक ~ भर्तृहरि
●श्रृंगारशतक ~ भर्तृहरि
●वैरण्यशतक ~ भर्तृहरि
●हिन्दुइज्म ~ नीरद चन्द्र चौधरी
●पैसेज टू इंगलैंड ~ नीरद चन्द्र चौधरी
●अॉटोबायोग्राफी अॉफ ऐन अननोन इण्डियन ~ नीरद चन्द्र चौधरी
●कल्चर इन द वैनिटी वैग ~ नीरद चन्द्र चौधरी
●मुद्राराक्षस ~ विशाखदत्त
●अष्टाध्यायी ~ पाणिनी
●भगवत् गीता ~ वेदव्यास
●महाभारत ~ वेदव्यास
●मिताक्षरा ~ विज्ञानेश्वर
●राजतरंगिणी ~ कल्हण
●अर्थशास्त्र ~ चाणक्य
●कुमारसंभवम् ~ कालिदास
●रघुवंशम् ~ कालिदास
●अभिज्ञान शाकुन्तलम् ~ कालिदास
●गीतगोविन्द ~ जयदेव
●मालतीमाधव ~ भवभूति
●उत्तररामचरित ~ भवभूति
●पद्मावत् ~ मलिक मो. जायसी
●आईने अकबरी ~अबुल फजल
●अकबरनामा ~अबुल फजल
●बीजक ●रमैनी ●सबद ~ कबीरदास
●किताबुल हिन्द ~ अलबरूनी
●कुली ~ मुल्कराज आनन्द
●कानफैंशंस अॉफ ए लव ~मुल्कराज आनन्द
●द डेथ अॉफ ए हीरो~मुल्कराज आनन्द
●जजमेंट ~ कुलदीप नैयर
●डिस्टेंन्ट नेवर्स~ कुलदीप नैयर
●इण्डिया द क्रिटिकल इयर्स~ कुलदीप नैयर
●इन जेल ~ कुलदीप नैयर
●इण्डिया आफ्टर नेहरू ~कुलदीप नैयर
●बिटवीन द लाइन्स ~कुलदीप नैयर
●चित्रांगदा ~रविन्द्र नाथ टैगौर
●गीतांजली~रविन्द्र नाथ टैगौर
●विसर्जन ~रविन्द्र नाथ टैगौर
●गार्डनर ~रविन्द्र नाथ टैगौर
●हंग्री स्टोन्स ~रविन्द्र नाथ टैगौर
●गोरा ~ रविन्द्र नाथ टैगौर
●चाण्डालिका~ रविन्द्र नाथ टैगौर
●भारत-भारती ~ मैथलीशरण गुप्त
●डेथ अॉफ ए सिटी~ अमृता प्रीतम
●कागज ते कैनवास~ अमृता प्रीतम
●फोर्टी नाइन डेज~ अमृता प्रीतम
●इन्दिरा गाँधी रिटर्नस ~खुशवंत सिहं
●दिल्ली ~खुशवंत सिहं
●द कम्पनी अॉफ वीमैन ~ खुशवंत सिहं
●सखाराम बाइण्डर ~ विजय तेंदुलकर
●इंडियन फिलॉस्पी ~डॉ. एस. राधाकृष्णन
●इंटरनल इंडिया ~इंदिरा गाँधी
●कामयानी ~जयशंकर प्रसाद
●आँसू ~ जयशंकर प्रसाद
●लहर ~ जयशंकर प्रसाद
●लाइफ डिवाइन ~अरविन्द घोष
●ऐशेज ऑन गीता ~अरविन्द घोष
●अनामिका ~सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
●परिमल ~सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
●यामा ~ महादेवी वर्मा
●ए वाइस अॉफ फ्रिडम ~नयन तारा सहगल
●एरिया अॉफ डार्कनेस ~वी. एस. नायपॉल
●अग्निवीणा ~ काजी नजरुल इस्लाम
●डिवाइन लाइफ ~ शिवानंद
●गोदान ~ प्रेमचन्द्र
●गबन ~ प्रेमचन्द्र
●कर्मभूमि ~ प्रेमचन्द्र
●रंगभूमि ~ प्रेमचन्द्र
●अनटोल्ड स्टोरी ~बी. एम. कौल
●कन्फ्रन्डेशन विद पाकिस्तान ~बी. एम. कौल
●कितनी नावों में कितनी बार ~अज्ञेय
●गोल्डेन थेर्सहोल्ड ~सरोजिनी नायडू
●ब्रोकेन विंग्स ~सरोजिनी नायडू
●दादा कामरेड ~ यशपाल
●पल्लव ~ सुमित्रानन्दन पंत्त
●चिदम्बरा~ सुमित्रानन्दन पंत्त
●कुरूक्षेत्र ~रामधारी सिहं 'दिनकर'
●उर्वशी ~रामधारी सिहं 'दिनकर'
●द डार्क रूम ~आर. के. नारायण
●मालगुड़ी डेज ~आर. के. नारायण
●गाइड ~आर. के. नारायण
●माइ डेज ~आर. के. नारायण
●नेचर क्योर ~ मोरारजी देसाई
●चन्द्रकान्ता ~देवकीनन्दन खत्री
●देवदास ~शरतचन्द्र चटोपाध्याय
●चरित्रहीन ~शरतचन्द्र चटोपाध्याय...

महान कार्यों से सम्बंधित व्यक्ति( Important personality)


1. ब्रह्मा समाज – राजाराममोहन राय
2. आर्य समाज – स्वामी दयानंद सरस्वती
3. प्रार्थना समाज – केशव चन्द्र सेन
4. दीन-ए-इलाही, मनसबदारी प्रथा – अकबर
5. भक्ति आंदोलन – रामानुज
6. सिख धर्म – गुरु नानक
7. बौद्ध धर्म – गौतमबुद्ध
8. जैन धर्म – महावीर स्वामी
9. इस्लाम धर्म की स्थापना, हिजरी सम्वत – हजरत मोहम्मद साहब
10. पारसी धर्म के प्रवर्तक – जर्थुष्ट
11. शक सम्वत – कनिष्क
12. मौर्य वंश का संस्थापक – चन्द्रगुप्त मौर्य
13. न्याय दर्शन – गौतम
14. वैशेषिक दर्शन – महर्षि कणाद
15. सांख्य दर्शन – महर्षि कपिल
16. योग दर्शन – महर्षि पतंजली
17. मीमांसा दर्शन – महर्षि जैमिनी
18. रामकृष्ण मिशन – स्वामी विवेकानंद
19. गुप्त वंश का संस्थापक – श्रीगुप्त
20. खालसा पन्थ – गुरु गोविन्द सिंह
21. मुगल साम्राज्य की स्थापना – बाबर
22. विजयनगर साम्राज्य की स्थापना – हरिहर व बुक्का
23. दिल्ली सल्तनत की स्थापना – कुतुबुद्दीन ऐबक
24. सतीप्रथा का अंत – लॉर्ड विलियम बेंटिक
25. आंदोलन : असहयोग,सविनय अवज्ञा, खेडा, चम्पारन, नमक, भारत छोडो – महात्मा गाँधी

Sunday, April 26, 2020

जलियाँवाला बाग हत्याकांड 1919

13 अप्रैल 1919 को बैसाखी का दिन था। इसी दिन, 13 अप्रैल 1699 को दसवें और अंतिम गुरु गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। इसीलिए बैसाखी पंजाब और आस-पास के प्रदेशों का सबसे बड़ा त्योहार है और सिख इसे सामूहिक जन्मदिवस के रूप में मनाते हैं। अमृतसर में उस दिन एक मेला सैकड़ों साल से लगता चला आ रहा था जिसमें उस दिन भी हज़ारों लोग दूर-दूर से आए थे। दो नेताओं सत्यपाल और सैफ़ुद्दीन किचलू को गिरफ्तार कर कालापानी की सजा दे दी गईइसके विरोध मे बैसाखी के दिन 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक सभा रखी गई, जिसमें कुछ नेता भाषण देने वाले थे। शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था, फिर भी इसमें सैंकड़ों लोग ऐसे भी थे, जो बैसाखी के मौके पर परिवार के साथ मेला देखने और शहर घूमने आए थे और सभा की खबर सुन कर वहां जा पहुंचे थे। जब नेता बाग में पड़ी रोड़ियों के ढेर पर खड़े हो कर भाषण दे रहे थे, तभी ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर 90 ब्रिटिश सैनिकों को लेकर वहां पहुँच गया। उन सब के हाथों में भरी हुई राइफलें थींसैनिकों ने बाग को घेर कर बिना कोई चेतावनी दिए निहत्थे लोगों पर गोलियाँ चलानी शुरु कर दीं। १० मिनट में कुल 1650 राउंड गोलियां चलाई गईं। जलियांवाला बाग उस समय मकानों के पीछे पड़ा एक खाली मैदान था। वहाँ तक जाने या बाहर निकलने के लिए केवल एक संकरा रास्ता था और चारों ओर मकान थे। भागने का कोई रास्ता नहीं था। कुछ लोग जान बचाने के लिए मैदान में मौजूद एकमात्र कुएं में कूद गए, पर देखते ही देखते वह कुआं भी लाशों से पट गया आधिकारिक रूप से मरने वालों की संख्या 379 बताई गई जबकि पंडित मदन मोहन मालवीय के अनुसार कम से कम 1300 लोग मारे गए। स्वामी श्रद्धानंद के अनुसार मरने वालों की संख्या 1500 से अधिक थी जबकि अमृतसर के तत्कालीन सिविल सर्जन डॉक्टर स्मिथ के अनुसार मरने वालों की संख्या 1800 से अधिक थी
 गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने इस हत्याकाण्ड के विरोध-स्वरूप अपनी नाइटहुड को वापस कर दिया
जब जलियांवाला बाग में यह हत्याकांड हो रहा था, उस समय उधमसिंह वहीं मौजूद थे और उन्हें भी गोली लगी थी। उन्होंने तय किया कि वह इसका बदला लेंगे। 13 मार्च 1940 को उन्होंने लंदन के कैक्सटन हॉल में इस घटना के समय ब्रिटिश लेफ़्टिनेण्ट गवर्नर माइकल ओ ड्वायर को गोली चला के मार डाला।ऊधमसिंह को 31 जुलाई 1940 को फाँसी पर चढ़ा दिया गया। गांधी और जवाहरलाल नेहरू ने ऊधमसिंह द्वारा की गई इस हत्या की निंदा करी थी।

इस हत्याकांड ने तब 12 वर्ष की उम्र के भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। इसकी सूचना मिलते ही भगत सिंह अपने स्कूल से 12 मील पैदल चलकर जालियावाला बाग पहुंच गए थे।

Monday, September 10, 2018

नालंदा विश्वविद्यालय की नई शुरुआत


नालंदा विश्वविद्यालय विश्व सर्वप्रथम विश्वविद्यालय में से एक है इसकी स्थापना 5वी शताब्दी ईसा पूर्व में हुई थी बताया जाता है कि महात्मा बुद्ध ने भी अपने जीवन काल के दौरान इस की यात्रा की थी इस की यात्रा की थी 7वी शताब्दी ईसा पूर्व अपने चरमोत्कर्ष पर इस विश्वविद्यालय में लगभग 10000 छात्रों को लगभग 2000 अध्यापकों के द्वारा शिक्षा दी जाती थी उसमें चीनी विद्वान  झुआन जांग ने भी इस विश्वविद्यालय का  दौरा किया था । नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त शासक कुमारगुप्त के शासनकाल के दौरान हुई थी 
पुनरुत्थान 
नालंदा के विनाश के 800 वर्ष बाद भारत की पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम द्वारा मार्च 2006 में बिहार राज्य विधान सभा को संबोधित करने के दौरान नालंदा विश्वविद्यालय को पुनर्जीवित करने के विचार को प्रेरित किया गया लगभग इसी दौरान सिंगापुर द्वारा भारत सरकार को नालंदा प्रस्ताव भेजा गया था इस प्रस्ताव में नालंदा विश्वविद्यालय की पुन स्थापना की मांग की एक बार फिर एशिया का केंद्र बिंदु होगा बिहार सरकार ने शीघ्र  ही इस दूरदर्शी  विचार को अपनाकर भारत सरकार से परामर्श किया और नालंदा विश्वविद्यालय के लिए उपयुक्त स्थान  की खोज  शुरू की इसके बाद राजगीर में 450 एकड़ भूमि का चयन कर उसका अधिग्रहण किया गया
अभिशासन 
भारत के राष्ट्रपति नालंदा विश्वविद्यालय की कुलाध्यक्ष  (विजिटर) है कुलपति (चांसलर) विश्वविद्यालय की प्रमुख और गवर्निंग बॉडी के अध्यक्ष है जो विश्वविद्यालय की शासी  निकाय की बैठकों और कनवोकेशन की अध्यक्षता करते हैं कुलाधिपति (वाइस चांसलर) विश्वविद्यालय के प्रमुख अकादमिक और कार्यकारी अधिकारी है वर्तमान में नालंदा विश्वविद्यालय के विजिटर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, चांसलर डॉ विजय भटकर और वाइस चांसलर, प्रोफेसर सुनैना सिंह है 

Friday, September 7, 2018

महर्षि दयानंद सरस्वती का आर्य समाज


आर्य समाज की  स्थापना  सन 1875 ई में महर्षि दयानंद सरस्वती ने की । सामाजिक क्षेत्र में दयानंद सरस्वती ने वर्ग तथा जाति व्यवस्था का बहिष्कार किया स्त्री शिक्षा पर विशेष बल दिया तथा स्त्री और पुरुषों को 'समान महत्व दिया इन्होंने विवाह के लिए लड़की की उम्र 16 वर्ष तथा लड़की की उम्र 25 वर्ष बतलाएं इनके द्वारा "दयानंद एंग्लो वैदिक कॉलेज" की स्थापना की की गई ।
 आर्य समाज द्वारा कुछ  शैक्षणिक और साहित्यिक सुधार भी किए गए और शायद सुधार भी किए  इन्होंने  संस्कृत में अनेक रचनाओं के साथ साथ हिंदी में उसका अनुवाद कर साहित्य में इनकी सेवा की आश्रम व्यवस्था के महत्व को भी इन्होंने जगाया ।
 इनकी मृत्यु के पश्चात आर्य समाज दो वर्गों में विभक्त हो गया एक वर्ग लाला हंसराज पश्चिमी शिक्षा के समर्थक थे इनके द्वारा विभिन्न नगरों में D.A.V  नामक शैक्षणिक संस्थाए  खोली गई दूसरे वर्ग समर्थक महात्मा मुंशीराम थे जो प्राचीन भारतीय पद्धति को महत्व देते थे
इनके द्वारा  पौराणिक धर्म का खंडन किया गया उन्होंने वैदिक धर्म का पक्ष लिया सत्यार्थ प्रकाश में आर्य  समाज की प्रसिद्ध पुस्तक में धार्मिक विचारों का उल्लेख किया गया है इन्होंने संप्रदाय,मूर्ति ,पूजा , जात पात देव पूजा आदि को व्यर्थ   माना इन्होंने निर्गुण और निराकार ईश्वर की पूजा पर बल दिया इन्होंने इस्लाम तथा ईसाई  की पोप  लीलाओं का खंडन कर एकीश्वरवाद को माना  इनके द्वारा मनुष्य की मुक्ति  सत्कर्मों ,ईश्वर की उपासना और ब्रह्मचर्य वक्त के द्वारा हो सकती है।

Wednesday, September 5, 2018

महत्वपूर्ण विद्रोह Part 2

4) अगला 1858-59 का इंडिगो विद्रोह है। कपड़ों के मरने के लिए यूरोप में इंडिगो की बड़ी मांग थी और चूंकि भारत एक उपनिवेश था, इसलिए अंग्रेजों (भाड़े के ईआईसी) ने भारतीय किसानों की कृषि भूमि को इंडिगो का एक अच्छा स्रोत अपने लालच को पूरा करने के लिए पाया। 1833 अधिनियम में प्लांटर्स को एक स्वतंत्र हाथ दिया गया था और उन्होंने किसानों को अधिक से अधिक इंडिगो विकसित करने के लिए मजबूर कर दिया (और उन्हें बाजार मूल्य की तुलना में नगण्य राशि का भुगतान किया गया)। किसानों के बीच बढ़ती असंतोष के साथ, यह अंग्रेजों के खिलाफ किसानों के हिंसक विद्रोह का आकार ले लिया। लेकिन भाग्य के खिलाफ कौन जा सकता है। अंग्रेजों ने फिर से इस विद्रोह को दबाने में सफल रहे। लेकिन यह विद्रोह कुछ यूरोपीय लोगों के दिल को जीतने में सफल रहा था। दीनबंधु मित्र द्वारा लिखित नील दर्पण, एक नाटक के माध्यम से इस विद्रोह का प्रतिबिंब है। Image result for munda rebellion 
 5) अगला 1899-1900 का मुंडा विद्रोह है। मुंडास अपने ही देश में ज़मीनदारों और ठेकेदारों  द्वारा व्यापारियों के रूप में आए थे। अंग्रेजों ने जनजातियों की एक बड़ी आबादी को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने में सक्षम किया, जिसने ईसाई और गैर-ईसाई मुंडाओं के बीच एक विवाद विकसित किया। तो कृषि असंतोष और ईसाई धर्म का डर, काफी हद तक, मुंडा को फिरानियों के खिलाफ एकजुट करने में मदद करता था। बिरसा मुंडा एक नेता के रूप में उभरा। वह मुंडा को अपने आप को विदेशी प्रभाव से मुक्त करने और अपने पारंपरिक मूल्यों को बहाल करने के समर्थक थे। उन्हें जेल भेजा गया था। लेकिन विद्रोह ने बड़ा फॉर्म लिया जब 1899 दिसंबर में यह हिंसक हो गया। आखिरकार इसे जनवरी 1900 में दबा दिया गया था। लेकिन विद्रोह अंग्रेजों को हिलाकर रखने में सक्षम था और आखिरकार उन्हें 1908 के चॉटानागपुर टेनेंसी अधिनियम को लाना पड़ा, जिसने मुंडा को अपनी जमीन के बारे में कुछ कानूनी अधिकार दिए।
ये कुछ विद्रोह थे। यद्यपि ये क्षेत्रीय और विविध प्रकृति के क्षेत्रीय थे, ये 1857 क्रांति के लिए एक बड़ा मंच बना रहे थे

महत्वपूर्ण विद्रोह Part 1


कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण विद्रोह जिसने १८५७ की नीव रख दी जो की निम्न है

1) अनुक्रम में सबसे पहले सन्यासी विद्रोह एक बड़ी अवधि के दौरान फैला हुआ है - 1760-1800। एक तपस्या करने के लिए जो एक हिंदू वैरागी या मुस्लिम फकीर था, पश्चिम से पूर्व में उत्तर भारत से बंगाल तक और पूर्व में असम तक, मार्ग (गांवों और ज़मीनदारों के प्रधान  से) एकत्रित धन उनके अस्तित्व का एकमात्र स्रोत था। प्लास्सी की लड़ाई के बाद जब अंग्रेजों को बंगाल, बिहार और ओडिशा के दीवानी अधिकार प्राप्त हुए तो उन्होंने करों या दीवानी के नाम पर प्रधान  और ज़मीनदारों से धन निकालना शुरू कर दिया, प्रधान  अब और अधिक संन्यासी का समर्थन करने की स्थिति में नहीं थे। इसने सान्यासिस में नाराजगी पैदा की और अंत में वे विद्रोह कर रहे थे। यद्यपि विद्रोह क्रूरता से कुचल दिया गया था, यह निश्चित रूप से आने वाले समय में कई महान विद्रोहियों का पिता था।
2) दूसरा वेल्लोर विद्रोह है (जो कई इतिहासकार मानते हैं कि ब्रिटिशों के खिलाफ बड़े पैमाने पर पहला सशस्त्र विद्रोह था)। 1805 में अंग्रेजों ने सैनिकों के ड्रेस कोड को बदल दिया जहां हिंदुओं को उनके माथे पर किसी भी पवित्र प्रतीक (टिक या तिलक इत्यादि) का उपयोग करने से रोक दिया गया था और मुसलमानों को दाढ़ी और मूंछों को दाढ़ी देने के लिए कहा गया था। इसने हिंदुओं और मुसलमानों दोनों को नाराज कर दिया। तो यहां हम देखते हैं कि विद्रोह के लिए बढ़ता कारण एक धार्मिक था। तो उन्होंने क्या किया  उन्होंने 1806 जुलाई में कुछ जनरलों की हत्या शुरू कर दी और अपने शासक फूटते हैदर (टीपू सुल्तान के पुत्र) की घोषणा की। बाद में विद्रोह को कर्नल गिलेस्पी ने कुचल दिया और कई सैनिक मारे गए और कई कैद हो गए।
3) तीसरा बिहार, झारखंड, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में इस क्षेत्र में संथाल विद्रोह है। यह भी उदार धन उधारदाताओं (आदिवासी वस्तुओं को खरीदने और फसल के बाद इसे चुकाने के लिए आदिवासी भूमि के नुकसान की वजह से था)। विद्रोह के नेता भाई-सिद्धू और कानू थे जिन्होंने 1855 में विद्रोह (जो कि विरोधी सामंती और विरोधी राज्य प्रकृति की तरह था) का नेतृत्व किया और उन्होंने बड़े ज़मीनदारों और धन उधारदाताओं की हत्या शुरू कर दी और कई जगहों पर ब्रिटिश सैनिकों को भी हराया। लेकिन आखिर में अंग्रेजों ने मार्शल लॉ लगाया और इस विद्रोह को खत्म कर दिया हजारों विद्रोहियों की हत्या कर दी (जो ज्यादातर धनुष और तीर के साथ किसान थे)।

Tuesday, September 4, 2018

चरकसंहिता की झलक


चरक भारतीय चिकित्सा के पिता थे
वह आयुर्वेद में मुख्य योगदानकर्ता हैं और उन्होंने चरक संहिता की भी रचना की है
चरक का मतलब है "चिकित्सक घूमना" इतिहास में चरक के रूप में पहचाने जाने वाले लोगों का एक समुदाय हो सकता है।
आयुर्वेद का अर्थ है "जीवन का ज्ञान"। आयुर्वेद संतुलन जीवन पर केंद्रित है।

लाइफ साइंस लाइफ के अनुसार चार प्रकार हैं:
(1) सुख 
(2) दुख 
(3) हित 
(4) अहित 

उन्होंने कहा कि दिल वह केंद्र है जो पूरे शरीर को नियंत्रित करता है, यह 13 मुख्य चैनलों के माध्यम से शरीर को जोड़ता है। यदि उन चैनलों में किसी प्रकार की बाधा मौजूद है तो शरीर असामान्य स्थितियों में होगा। उन्होंने कहा कि शरीर में दांत सहित 360 हड्डियां होती हैं
उन्होंने पाचन, प्रतिरक्षा और चयापचय पर बहुत कुछ लिखा
8 वीं शताब्दी में अग्निवेश तंत्र अग्निवेश ने लिखा था। इसका पुनर्लेखित रूप चरक संहिता है। अग्निवेश ने ऋषि अत्रेय से ज्ञान प्राप्त किया, जिनकी वैदिक संस्कृति में बड़ा नाम था। ऋषि अत्रिया तक्षशाला, गंधर में रहते थे

चरक संहिता का ढांचा:
इसमें 8 किताबें और 120 अध्याय हैं
यह चिकित्सा की नींव है
कई बीमारियों पर दवाएं
आहार, स्वच्छता, रोकथाम, चिकित्सा शिक्षा पर भी जोर दिया जाता है

8 किताबें:
1) सूत्र स्थान
2) निदान स्थान 
3) विमन स्थान
4) शरीर स्थान
5) इंडियनस्थान 
6) चिकित्ता स्थान 
7) कलापा स्थान 8) सिद्धी स्थान 
चिकित्सक और नर्सों के लिए नैतिकता के निदान शिहान कोड के 8 वें और 9वें अध्याय में दिया गया है

मानव शरीर में कुछ जन्मजात तत्व होते हैं:
5 प्रकृति + 1 ब्रह्म
3 गुन..राज, तमा और सतवा
3 । वता, पिट्टा, कफ

10 वीं शताब्दी में,  चक्रपाणि  ने चरक संहिता पर टिका लिखी थी

Monday, September 3, 2018

1857 का विद्रोह 12 वाक्य मे

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आजादी का पहला युद्ध- 1857  -
1. कई 'दंगों' और आदिवासी युद्धों को दबाने के बाद, ब्रिटिश राज को 1857 के गर्मियों में असंगठित लेकिन 'आजादी का पहला युद्ध' का सामना करना पड़ा जो 100 से अधिक वर्षों से पैदा हो रहा था।
2. सूअर  का मांश  और गोमांस के तने के साथ गठित एनफील्ड राइफल कारतूस का परिचय कई अतिरिक्त कारणों से समर्थित तत्काल कारण माना जाता है जैसे कि हड़प का  सिद्धांत की नीति, किसानों पर भारी भूमि राजस्व, धार्मिक प्रथाओं और परंपराओं में हस्तक्षेप, ईसाई धर्म का प्रचार और एक भ्रष्ट और उत्तरदायी प्रशासन प्रणाली।

3 .पश्चिम बंगाल में बराकपुर से शुरू हुआ जहां सेपॉय मंगल पांडेय ने दो ब्रिटिश अधिकारियों को मारदिया जो पूरे भारत में फैल गए। किसी भी आम नेता की अनुपस्थिति के कारण विद्रोहियों ने कानपुरमें नाना साहेब, झांसी में रानी लक्ष्मी बाई, लखनऊ में बेगम हजरत महल और बरेली में खान बहादुर जैसे स्थानीय नेताओं की ओर रुख किया।

4. मेरठ से विद्रोहियों पर हमला हुआ और निकटतम बिजली केंद्र-दिल्ली पहुंचे जहां उन्होंने 80 वर्षीय मुगल सम्राट को उनके नेता और भारत के सम्राट के रूप में घोषित किया।
5. 1857 के विद्रोह ने पूरे देश में फैलाया और बहुत लोकप्रिय था लेकिन विदेशी शासन के लिए साझा साझा नफरत और उनके व्यक्तिगत खोए गए विशेषाधिकारों की कहानियों के अलावा विद्रोहियों के पास कोई निश्चित दृष्टि और नेतृत्व नहीं था। इसलिए, आजादी के पहले युद्ध का अंत इसकी शुरुआत से शुरू होता है।
6. न केवल मूल पक्ष पर भागीदारी की कमी थी बल्कि उस समय के कई महत्वपूर्ण शासकों ने भी युद्ध के दूसरी तरफ थे। लॉर्ड कैनिंग इसे बहुत अच्छी तरह से जानते थे और इसके समर्थन प्रणाली को कमजोर करके विद्रोह को रोकना शुरू कर दिया था।
 7. देश के पक्ष में, युद्ध स्थापित उधारदाताओं, ज़मीनदार और व्यापारियों जैसे स्थापित अधिकारियों के खिलाफ था। यह 'ऊपरी' वर्ग अंग्रेजों के प्रति वफादार रहा। वे विद्रोहियों को आपूर्ति से इंकार कर समर्थन वापस लेने वाले पहले व्यक्ति थे।
8. आधुनिक शिक्षित भारतीय जो ब्रिटिश राज को उखाड़ फेंकने के विद्रोहियों के तरीकों से नाखुश थे। उन्होंने गलती से विश्वास किया कि विदेशी शासन पिछड़ापन खत्म कर देगा। स्वराज के महत्व को समझने के लिए उन्होंने कई और दशकों का समय लिया और यह अहसास बहुत भारी कीमत पर आया।
9. स्थानीय राजाओं और  बड़े ज़मींदार की मदद से पुरुषों, धन और हथियारों के साथ मजबूर हुए अंग्रेजों ने अपनी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की ऊंचाई के तहत विद्रोह को कुचल दिया, योजना बनाने और सत्ता को अपने स्वयं के भाइयों के खिलाफ लोगों के मूल शक्तिशाली और 'शिक्षित' वर्ग को मनाने के लिए मजबूर किया। बहन की।
10. 1859 के अंत तक रानी लक्ष्मी बाई, तांतिया टोपी जैसे कई विद्रोही नेताओं द्वारा दिखाए गए अभूतपूर्व बहादुरी के बाद विद्रोह का समर्थन करने वाले प्रत्येक नेता को या तो कैद या निष्पादित किया गया था।
11. भारत पर ब्रिटिश अधिकार पूरी तरह से फिर से स्थापित किया गया था, जो अब सीधे ताज नियम और युद्ध से सीखे गए पाठों पर स्थापित कई अन्य प्रमुख प्रशासनिक परिवर्तनों के साथ लागू हुआ था।
12. हालांकि अंग्रेजों ने सोचा कि वे युद्ध के लिए 'पूर्ण रोक' लगाने में सफल रहे हैं, लेकिन यह 'पूर्ण-स्टॉप' केवल अल्पविराम बन जाएगा। युद्ध ने भारतीय लोगों के दिमाग पर अविस्मरणीय छाप छोड़ी और बहादुरी और साहस के कई उपाख्यानों को छोड़ दिया जो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के उदय के लिए मार्ग प्रशस्त करेंगे।